संपादक दिनेश बम शैल ग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर उत्तराखंड ।
भारत का संविधान केवल शासन का ढांचा नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक अनुबंध है, जो समान अवसर, न्याय और गरिमा की गारंटी देता है। शिक्षा इसी अनुबंध का सबसे सशक्त माध्यम है। हाल ही में यूजीसी क़ानून/प्रावधानों पर लगाई गई रोक इसी मूल भावना की पुनः पुष्टि करती है।
पिछले कुछ समय से यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर देशभर में असंतोष देखने को मिला। आशंका यह थी कि इन नियमों से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता सीमित होगी, राज्यों की भूमिका कमजोर पड़ेगी और शिक्षा का अत्यधिक केंद्रीकरण होगा। शिक्षा को एक जीवंत सामाजिक प्रक्रिया के बजाय प्रशासनिक आदेशों में बाँध देने का खतरा स्पष्ट दिखाई देने लगा था।

यह प्रश्न केवल नियमन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहभागिता का भी है। शिक्षा नीति यदि संवाद, सहमति और ज़मीनी यथार्थ से कटकर बनाई जाएगी, तो वह सुधार के बजाय विघटन का कारण बन सकती है। यूजीसी जैसे संस्थान का उद्देश्य दिशा देना है, नियंत्रण थोपना नहीं। विश्वविद्यालय ज्ञान के प्रयोगशाला होते हैं, न कि आदेश पालन के केंद्र।
यूजीसी क़ानून पर रोक यह संकेत देती है कि सरकार ने व्यापक असहमति को गंभीरता से लिया है। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा सुधारों को संघीय ढांचे, सामाजिक विविधता और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार किया जाए।
छात्रों, शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों की चिंताओं को सुने बिना किया गया कोई भी बदलाव शिक्षा को कमजोर ही करेगा। शिक्षा को बाज़ार की भाषा में नहीं, बल्कि मानव विकास और सामाजिक न्याय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
आज जब भारत स्वयं को “ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, तब शिक्षा का लोकतांत्रिक, समावेशी और स्वतंत्र होना और भी आवश्यक हो जाता है। यूजीसी क़ानून पर लगी रोक एक अवसर है—आत्ममंथन का, संवाद का और सही दिशा तय करने का।
शिक्षा पर निर्णय आदेश से नहीं, विचार से होने चाहिए।

