गोलुज्यु मंदिर रुद्रपुर में उमड़ा आस्था का सैलाब

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शैल परिषद ने रच दिया लोकसंस्कृति और भक्ति का अद्भुत संगम

संपादक दिनेश बम रुद्रपुर, शैल ग्लोबल टाइम्स।

रुद्रपुर स्थित श्री गोल्ज्यू महाराज मंदिर में आस्था और श्रद्धा का ऐसा महासंगम देखने को मिला, मानो देवभूमि की आत्मा स्वयं सजीव हो उठी हो। जब आरती की लौ गोल्ज्यू महाराज की मूर्ति के समक्ष थरथराई, तो लगा जैसे देवता स्वयं भक्तों के बीच उपस्थित हों। पूजा-अर्चना के उपरांत आरंभ हुआ उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का अनुपम प्रतीक — ‘जागर’, जो देर रात तक चलता रहा और वातावरण को दिव्यता से भर गया।

जागर: लोक और देवता के बीच संवाद का सेतु

जागर केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि देवता और लोक के बीच जीवंत संवाद है। ढोल-दमाऊं की थाप, भाना की गूंज, और लोकगाथाओं की स्वर-लहरियां — यही उत्तराखंड की आत्मा हैं। जब “जय गोल्ज्यू देवता की जय” की पुकार गूंजी, तो मानो धरती और आकाश के बीच का फासला मिट गया।

गायकों की आवाज़ों में जहां न्याय और सत्य की गाथाएँ थीं, वहीं हर ताल पर श्रद्धालुओं की आस्था थिरक उठी। गोल्ज्यू महाराज की यह आराधना लोकविश्वास का जीवंत प्रमाण है कि सत्य और धर्म अंततः विजयी होते हैं।

शैल परिषद: संस्कृति की संवाहक शक्ति

इस भव्य आयोजन की सूत्रधार रही शैल परिषद (शैल सांस्कृतिक समिति), जिसने यह सिद्ध कर दिया कि जब संस्कृति और समाज साथ खड़े हों, तो आस्था का दीपक और भी प्रखर हो उठता है।

मुख्य संरक्षक भारत लाल साह, अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल, महामंत्री एडवोकेट दिवाकर पांडे, कोषाध्यक्ष डी.के. दनाई, एवं समर्पित कार्यकर्ता— दिनेश बम, सतीश लोहनी, कीर्ति निधि शर्मा, राजेंद्र बोरा, हरीश दनाई, मोहन उपाध्याय, संजीव बुधोली, महेश कांडपाल, हरीश मिश्रा, दान सिंह मेहरा, रमेश चंद्र जोशी, डॉ. एल.एम. उप्रेती, धीरज पांडेय, नरेंद्र रावत, पूरन चंद्र जोशी, धीरज गोस्वामी, त्रिभुवन जोशी, मुकुल उप्रेती, बिनीता पांडे, नीलम पंडाल, गीता बिष्ट , किरन बोरा , चंदा बम, दुर्गा साह, डॉ. अमिता उप्रेती, धीरज पांडे, एड. सर्वेश सिंह, संजय ठुकराल, पार्षद पवन राणा, रमेश चंद्र भट्ट, ललित उप्रेती, सुभाष जोशी, एड. शिव कुमार, लाल सिंह मेहरा आदि — सभी ने इस आयोजन को सशक्त रूप दिया।

भक्ति में समरसता और एकता का संदेश

पूरे कार्यक्रम में भक्ति का रंग केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा। महिलाओं की मधुर लोकधुनों और पुरुषों की गाथागायन ने एक ऐसी समरसता रची, जिसने समाज के हर वर्ग को एक सूत्र में बांध दिया।

हर ओर एक ही संदेश था —

“गोल्ज्यू महाराज सबके हैं — ऊँच-नीच, अमीर-गरीब का भेद नहीं; जो सच्चा है, वही उनका अपना है।”

आध्यात्मिक नेतृत्व की गूंज

शैल परिषद अध्यक्ष भोपाल सिंह पटवाल ने कहा —

“गोल्ज्यू महाराज केवल हमारे आराध्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड के आत्मविश्वास के प्रतीक हैं। जब अन्याय बढ़ता है, तब न्याय के देवता स्वयं सामने आते हैं। हमें उनकी आस्था को पूजा तक सीमित नहीं रखना, बल्कि उसे जीवन की नीति बनाना चाहिए।”

महासचिव एडवोकेट दिवाकर पांडे ने अपने उद्बोधन में कहा

“जागर केवल धार्मिक क्रिया नहीं, यह लोकचेतना का स्पंदन है। जब हम गोल्ज्यू महाराज का जागर करते हैं, तब हम अपने पूर्वजों, अपनी भूमि और अपनी अस्मिता से जुड़ते हैं — यही उत्तराखंड की असली पहचान है।”

न्याय के देवता, इस लोक के भगवान हैं गोलू देवता।

कुमाऊं अंचल में गोल्ज्यू महाराज को “न्याय के देवता” के रूप में पूजा जाता है। लोकविश्वास है कि जो भी सच्चे मन से इनसे अपनी विनती करता है, उसे न्याय अवश्य मिलता है।

इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपने मन की बात महाराज के चरणों में रखी — किसी ने संतान की कामना की, किसी ने गृहशांति की, तो किसी ने अन्याय के विरुद्ध साहस की शक्ति मांगी।

आधुनिकता में आध्यात्मिकता की लौ

आज जब समाज तेज़ी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में शैल परिषद का यह आयोजन केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्म-चेतना का जागरण था।

गोल्ज्यू महाराज मंदिर की स्थापना का यह प्रथम वर्ष यह संदेश लेकर आया कि परंपरा और प्रगति साथ-साथ चल सकती हैं। यह वही भूमि है जहां भक्ति और विद्रोह दोनों का संगम होता है, और जहां न्याय के लिए जन-मन एक स्वर में पुकारता है —/