भारत–अमेरिका संबंध दशकों के निचले स्तर पर

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कृषि पहुंच को लेकर अटका व्यापार समझौता, टैरिफ ने बढ़ाया तनाव

दिनेश बम शैल ग्लोबल टाइम्स

अंतरराष्ट्रीय मामलों पर विशेष विश्लेषण

नई दिल्ली / वाशिंगटन।

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को लेकर 2025 का वर्ष अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर साबित हो रहा है। दोनों देशों के रिश्ते दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक के टैरिफ और लंबे समय से रुकी व्यापार वार्ताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को गहरे तनाव में डाल दिया है।

हडसन इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो अपर्णा पांडे ने आईएएनएस से बातचीत में कहा,

“एक स्तर पर, यह वह साल है जब भारत–अमेरिका संबंध लगभग चट्टान के नीचे पहुंच गए हैं।”

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब 9 से 11 दिसंबर के बीच नई दिल्ली में दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ताएं दोबारा शुरू हुईं, जिन्हें 2025 में जारी विवादों को सुलझाने की एक और कोशिश माना जा रहा है।

कृषि और डेयरी बना सबसे बड़ा रोड़ा

भारत–अमेरिका व्यापार समझौते में सबसे बड़ी बाधा अमेरिकी पक्ष की भारत के कृषि और डेयरी बाजारों तक पहुंच की मांग बनी हुई है। भारत सरकार ने इस मांग को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत अमेरिकी रक्षा उपकरण, ऊर्जा आपूर्ति और विमानन उत्पादों की खरीद बढ़ाने के लिए तैयार है, लेकिन कृषि क्षेत्र पर कोई समझौता नहीं होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त में कहा था—

“हम अपने किसानों, डेयरी क्षेत्र और मछुआरों के हितों से समझौता नहीं करेंगे।”

गौरतलब है कि भारत में कृषि क्षेत्र लगभग 1.4 अरब आबादी के करीब आधे हिस्से को रोजगार देता है, हालांकि अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग 16 प्रतिशत है।

उधर, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि भारत का प्रस्ताव अब तक का “सबसे बेहतर” है, लेकिन भारत अब भी अमेरिका के लिए “तोड़ने में कठिन मेवा” बना हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय चावल पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के संकेत भी दिए हैं, डंपिंग की आशंकाओं का हवाला देते हुए।

टैरिफ से बिगड़े रिश्ते

2025 की शुरुआत में दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक संकेत दिखे थे। फरवरी में प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति ट्रंप से व्हाइट हाउस में मिलने वाले चौथे वैश्विक नेता बने थे। उस दौरान COMPACT पहल की घोषणा हुई, जिसका उद्देश्य रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापार सहयोग को मजबूत करना था।

हालांकि मई में भारत द्वारा ट्रंप के भारत–पाकिस्तान युद्धविराम मध्यस्थता के दावों को खारिज किए जाने के बाद रिश्तों में खटास आ गई।

इसके बाद अगस्त में ट्रंप प्रशासन ने:

  • भारतीय वस्तुओं पर 25% पारस्परिक टैरिफ, और
  • रूस से तेल खरीद को लेकर 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाया,

जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया।

स्थिरीकरण के सतर्क संकेत

तमाम तनावों के बावजूद हालिया घटनाक्रम कुछ हद तक स्थिरता की ओर इशारा करते हैं। 10 दिसंबर को प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई, जो टैरिफ वृद्धि के बाद उनकी तीसरी बातचीत थी। इसमें व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।

सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के सीनियर एडवाइजर रिचर्ड रॉसो के अनुसार,

“2025 में राजनीतिक डगमगाहट देखने को मिली, लेकिन मौजूदा चरण अपेक्षाकृत शांत है और यह 2026 में बेहतर परिणामों की जमीन तैयार कर सकता है।”

आगे की राह

अपर्णा पांडे का मानना है कि संबंधों में वास्तविक सुधार इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका भारत को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है या केवल लेन–देन आधारित लाभ तक सीमित रखता है।

“अभी यह एक लेन–देन वाला संबंध है, पूरी तरह रणनीतिक साझेदारी नहीं।”

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने संकेत दिया है कि मार्च 2026 तक एक ढांचागत व्यापार समझौता संभव है, हालांकि पूर्ण द्विपक्षीय व्यापार समझौते में इससे अधिक समय लग सकता है।

दिनेश बम शैल ग्लोबल टाइम्स

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