UGC के हालिया प्रावधानों पर एक संवैधानिक और मानवीय विमर्श
दिनेश बम की ✍️ से विशेष लेख | शैल ग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर उत्तराखंड
भारत का संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह करोड़ों साधारण नागरिकों की आकांक्षाओं, संघर्षों और सपनों की सामूहिक अभिव्यक्ति है। इसी संविधान की आत्मा में शिक्षा को वह केंद्रीय स्थान दिया गया है, जो किसी भी लोकतंत्र को जीवंत, न्यायपूर्ण और समान अवसरों वाला बनाता है।

आज, जब देश में उच्च शिक्षा से जुड़े University Grants Commission (UGC) के हालिया प्रावधान लागू किए जा रहे हैं, तब यह आवश्यक हो गया है कि हम केवल नियमों की शाब्दिक व्याख्या तक स्वयं को सीमित न रखें, बल्कि उनके मानवीय, सामाजिक और संवैधानिक प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार करें।
यह प्रश्न किसी एक वर्ग, किसी एक विश्वविद्यालय या किसी एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है।
यह प्रश्न उस छात्र का है, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आकर बड़े सपने देखता है।
यह प्रश्न उस मध्यमवर्गीय परिवार का है, जो सीमित साधनों में अपने बच्चे को पढ़ाने का साहस करता है।
और यह प्रश्न उन गरीब माता-पिता की पुकार है, जिनके लिए शिक्षा ही सामाजिक न्याय और सम्मानजनक जीवन का एकमात्र मार्ग है।
UGC के नए प्रावधानों का उद्देश्य भले ही गुणवत्ता और संरचना में सुधार बताया जा रहा हो, किंतु ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन नियमों का बोझ सबसे पहले और सबसे अधिक उन्हीं कंधों पर पड़ता है, जो पहले से ही सबसे कमजोर हैं।
जब शिक्षा की लागत बढ़ती है,
जब प्रवेश की शर्तें और अधिक जटिल होती हैं,
जब स्थानीय और क्षेत्रीय संस्थानों की भूमिका सीमित होती है—
तो अवसरों के दरवाज़े सबसे पहले उन्हीं के लिए बंद होते हैं, जिनके पास विकल्प नहीं होते।
भारत का संविधान
अनुच्छेद 14 में समानता,
अनुच्छेद 15 में सामाजिक न्याय,
और अनुच्छेद 21A में शिक्षा के अधिकार की बात करता है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—
क्या कानून वास्तव में सबके लिए समान है?
क्या सभी भारतीयों को समान अवसर मिल रहे हैं?
क्या शिक्षा का अधिकार व्यवहार में भी उतना ही सुलभ है, जितना वह संविधान में लिखा गया है?
ये प्रश्न केवल अकादमिक बहस नहीं हैं।
ये वे प्रश्न हैं, जो आने वाले समय में सत्ता के मार्ग में कांटों की तरह खड़े हो सकते हैं।
आज यह आत्ममंथन भी आवश्यक है कि जिस वर्ग ने वर्षों तक किसी राजनीतिक दल को अपना समर्थन दिया—
क्या अब उसके लिए सोचने का समय नहीं आ गया है?
या फिर यह मान लिया जाए कि राजनीति अब केवल कुछ वर्गों तक सीमित होती जा रही है,
और कुछ समुदायों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं बचा है?
यह कोई आरोप नहीं है।
यह एक प्रश्न है।
और लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्य है।
इसी संदर्भ में यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी एक दल की राजनीतिक मज़बूती के लिए केवल सत्ता पक्ष को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। यदि विपक्ष समय रहते अपनी भूमिका को सशक्त, जिम्मेदार और संवैधानिक ढंग से निभा पाता, तो शायद नीतिगत फैसलों पर इतना एकपक्षीय आत्मविश्वास संभव न होता।
एक सशक्त लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष—दोनों का संतुलन आवश्यक होता है।
और जब यह संतुलन कमजोर पड़ता है,
तो उसका प्रभाव नीतियों में स्पष्ट दिखाई देता है।
यह लेख टकराव की भाषा नहीं बोलता।
यह किसी संस्था के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाता।
यह केवल इतना निवेदन करता है कि नीति-निर्माण के केंद्र में मनुष्य को रखा जाए—आंकड़ों को नहीं।
आज का छात्र केवल डिग्री नहीं चाहता—
वह आत्मनिर्भरता चाहता है।
आज का युवा केवल प्रमाणपत्र नहीं चाहता—
वह सम्मानजनक भविष्य चाहता है।
यदि शिक्षा को केवल बाज़ार के नियमों पर छोड़ दिया गया,
तो वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का कार्य करेगी।
और यदि अवसर कुछ हाथों तक सिमट गए,
तो लोकतंत्र केवल शब्दों में सिमट कर रह जाएगा।
इसलिए यह समय विरोध का नहीं—
संवाद का है।
यह समय अस्वीकार का नहीं—
पुनर्विचार का है।
हम आशा करते हैं कि नीति-निर्धारक संस्थाएँ, सरकार और समाज—
तीनों मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ें
जो गुणवत्ता के साथ-साथ न्याय, समावेशिता और करुणा को भी समान महत्व दे।
क्योंकि शिक्षा केवल एक व्यवस्था नहीं है—
यह विश्वास है।
और जब विश्वास टूटता है,
तो उसका बोझ किसी एक वर्ग को नहीं,
पूरे राष्ट्र को उठाना पड़ता है।

