कुरैया से सुनीता सिंह की जीत और बीजेपी की हार क्या आने वाले समय में बी जे पी के लिए बुरी खबर का संकेत है ? संपादक दिनेश बम शैल ग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर ।

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उधम सिंह नगर की कुरैया जिला पंचायत सीट पर कांग्रेस की प्रत्याशी सुनीता सिंह की निर्णायक जीत ने न केवल एक स्थानीय चुनाव परिणाम को जन्म दिया, बल्कि भाजपा की रणनीतिक जमीन और सत्ता के बल पर चुनाव जीतने की परिकल्पना को चुनौती दे दी। यह जीत बताती है कि ग्रामीण भारत में अब ‘चेहरे’ नहीं, ‘चरित्र’ देखे जाते हैं — और सत्ता के समीकरणों की बजाय जमीन से जुड़े सरोकारों की गूंज ही चुनाव परिणाम तय करती है।

जिला पचायत क्षेत्र कुरैया से जिला पंचायत सदस्य पद पर कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी सुनीत सिंह जी 229 वोटो से जीतने पर बहुत बहुत बधाई…

कुरैया सीट: बीजेपी की ‘राजनीतिक प्रयोगशाला’ या आत्मघाती दांव?

भारतीय जनता पार्टी ने कुरैया को एक चुनावी प्रयोगशाला बना डाला। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इसे अपनी प्रतिष्ठा की सीट घोषित कर दिया। लेकिन टिकट वितरण से लेकर प्रचार तक, हर रणनीतिक निर्णय सत्ता के अहंकार से प्रभावित रहा। कोमल चौधरी को ‘ऊपर से थोपे गए उम्मीदवार’ के रूप में देखा गया, जिनकी कोई ठोस जमीनी पकड़ नहीं थी।

इसके उलट सुनीता सिंह एक संघर्षशील, सुलभ और जनसंपर्क में पारंगत चेहरा थीं। उन्होंने जमीनी स्तर पर अपने रिश्ते बनाए और जनता की नब्ज़ को समझा। बीजेपी का ‘प्रयोग’ यहां बुरी तरह असफल रहा — और उसने खुद अपनी हार की पटकथा लिख डाली।


विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा की रणनीतिक विफलता

कुरैया सीट पर बीजेपी की हार से सबसे ज़्यादा राजनीतिक क्षति रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा को हुई है। दोनों नेताओं ने इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। पार्टी कार्यकर्ताओं की पूरी टीम, प्रचार संसाधन, सोशल मीडिया हाइप — सब कुछ झोंक दिया गया। लेकिन ग्रामीण जनता ने साफ संदेश दे दिया कि राजनीति अब शहरों की चमक-दमक से नहीं, गांवों की धूल में उतरकर ही जीती जाती है।

स्थानीय मतदाताओं में यह धारणा स्पष्ट थी कि विधायक और महापौर का प्रभाव गांवों में सीमित है, और वे आमजन की समस्याओं से कटे हुए हैं। यही बीजेपी की पराजय का मुख्य कारण बना।


सुनीता सिंह: सादगी, संघर्ष और संवाद की जीत

सुनीता सिंह की जीत एक आदर्श केस स्टडी है कि आज भी यदि कोई उम्मीदवार सच्चे मन से जनता से जुड़ता है, तो पार्टी का झंडा अपने आप बुलंद हो जाता है। उन्होंने चुनाव प्रचार को किसी तमाशे की तरह नहीं, बल्कि गांव-गांव की पदयात्रा और जनसंवाद के माध्यम से आगे बढ़ाया।

उनकी सादगी और सहजता ने महिला मतदाताओं से लेकर बुज़ुर्ग किसानों तक को प्रभावित किया। वे मुद्दों को समझती रहीं — और वादों के बजाय भरोसे से वोट मांगे। यही भरोसा मतों में बदला और ऐतिहासिक जीत में तब्दील हो गया।


तिलकराज बेहड़: पर्दे के पीछे से कांग्रेस के ‘चाणक्य’

कांग्रेस की इस चुनावी सफलता के शिल्पकार पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तिलकराज बेहड़ भी हैं, जिन्होंने संगठन को दिशा दी, कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया और रणनीतिक तौर पर बीजेपी के चुनावी मोर्चे को तहस-नहस कर दिया।

बेहड़ की पकड़ केवल किच्छा तक सीमित नहीं रही — उन्होंने कांग्रेस को पूरे जनपद में पुनर्जीवित करने की पहल की। यह वही बेहड़ हैं, जिन्होंने पंचायत चुनाव को सिर्फ ‘स्थानीय चुनाव’ नहीं रहने दिया, बल्कि इसे बीजेपी बनाम जनता की लड़ाई बना डाला।


भाजपा के लिए चेतावनी: ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना पड़ेगा भारी

कुरैया की हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं है — यह भाजपा की रणनीतिक सोच पर गहरा प्रश्नचिह्न है। पार्टी यदि हर सीट को ‘कठपुतली नेतृत्व’ के भरोसे लड़ती रही, तो गांवों में उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। जातीय समीकरणों, सामाजिक संवाद और स्थानीय सम्मान को नज़रअंदाज़ करना, किसी भी पार्टी के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है।


रुद्रपुर की राजनीति में उथल-पुथल तय

इस हार ने रुद्रपुर की राजनीतिक जमीन को हिला दिया है। विधायक शिव अरोड़ा की पकड़ कमजोर हुई है, महापौर विकास शर्मा की नेतृत्व क्षमता सवालों के घेरे में है, और आम जनता अब ‘परिवर्तन’ की बात खुलकर करने लगी है।

विधानसभा चुनाव से पहले यदि भाजपा ने ज़मीनी संवाद की प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो यह हार अगली बड़ी राजनीतिक पराजयों की भूमिका बन सकती है। वहीं कांग्रेस को यह अवसर मिला है कि वह अपने संगठन को और सशक्त करे और जन मुद्दों को मजबूती से उठाए।

कुरैया से उठता जन-जागरण का बिगुल

कुरैया का परिणाम इस बात का प्रतीक है कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है। सत्ता, साधन और संरचना — सब कुछ विफल हो सकते हैं अगर संवाद, संवेदना और संघर्ष की भावना कमजोर हो। सुनीता सिंह की जीत और बीजेपी की हार, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं — एक तरफ जनविश्वास की विजय, दूसरी तरफ सत्ता के घमंड की हार।

कुरैया ने बता दिया है — गांवों की राजनीति अब दिल्ली की ‘डिजिटल सोच’ से नहीं, खेत-खलिहानों के अनुभव से चलेगी।