रुद्रपुर/देहरादून।
1 सितंबर 1994 का वह काला दिन आज भी उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में दर्ज है, जब राज्य निर्माण की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी खटीमा में सड़कों पर उतरे थे। शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे आंदोलन को अचानक गोलियों से दाग दिया गया और सात आंदोलनकारी शहीद हो गए। इस घटना ने न सिर्फ पूरे राज्य आंदोलन को नई दिशा दी बल्कि उत्तराखंड की संघर्ष गाथा में खटीमा का नाम हमेशा के लिए अंकित हो गया।
इन्हीं शहीदों की कुर्बानी और संघर्ष का परिणाम था कि वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। विडंबना और गर्व का विषय यह है कि आज उसी खटीमा की धरती से निकले नेता प्रदेश की बागडोर संभाल रहे हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हों या विधानसभा में विपक्ष के उपनेता भुवन कापड़ी, दोनों की जड़ें खटीमा से जुड़ी हैं।

खटीमा की इस ऐतिहासिक धरती ने हमेशा राजनीति और आंदोलन के केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। राज्य आंदोलनकारी विजय भट्ट बताते हैं कि 1994 की घटना ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। इसके बाद पूरे राज्य में आंदोलन तेज हो गया और शहीदों की याद में पदयात्राएं निकाली गईं। वास्तव में 1992 से ही उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर पदयात्रा शुरू हुई थी, जिसकी शुरुआत खटीमा से हुई और समापन नैनीताल में हुआ।
आज जब उत्तराखंड राज्य 25वां स्थापना दिवस मना रहा है, तब यह याद करना जरूरी है कि जिस धरती पर आंदोलन की गूंज उठी थी, उसी धरती के बेटे प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं। यह न केवल खटीमा बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण है।
शैल ग्लोबल टाइम्स परिवार सभी उत्तराखंडवासियों को उत्तराखंड दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करता है। 🌸
संपादक :- दिनेश बम शैल ग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर उत्तराखंड।

