संपादक दिनेश बम शैलग्लोबल टाइम्स खटीमा उधमसिंह नगर उत्तराखंड।
तुषार शर्मा की नृशंस हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह खटीमा की उस गहरी और पुरानी सामाजिक समस्या का भयावह परिणाम है, जिसे वर्षों से अनदेखा किया जाता रहा। घटना के बाद बाजार क्षेत्र का पुलिस छावनी में तब्दील हो जाना इस बात का प्रमाण है कि हालात कितने गंभीर हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह स्थिति अचानक पैदा हुई — या फिर इसे पनपने दिया गया?
खटीमा के इस्लाम नगर (गौटिया) क्षेत्र में रहने वाले एक विशेष समुदाय से अन्य समुदायों के लोगों को होने वाली परेशानी और भय कोई नई या आज की समस्या नहीं है। यह एक पुरानी, जटिल और लंबे समय से चली आ रही सामाजिक चुनौती है, जिसे स्थानीय लोग वर्षों से महसूस करते आ रहे हैं, लेकिन न तो प्रशासनिक स्तर पर इसका स्थायी समाधान निकाला गया और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति कभी पूरी गंभीरता से सामने आई।

मुख्यमंत्री के अपने नगर में बेबस सिस्टम
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे विडंबनापूर्ण और चिंताजनक बात यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का निवास और उनका कर्मक्षेत्र खटीमा ही है। जिस स्थान पर यह हत्याकांड हुआ, वह मुख्यमंत्री आवास से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। मुख्यमंत्री यहीं पले-बढ़े हैं, उन्होंने इस क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियों को न केवल देखा है बल्कि स्वयं भोगा भी है।
इसके बावजूद, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतने वर्षों में इस ज्वलंत समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकल पाया? क्या यह प्रशासनिक विफलता है, राजनीतिक चुप्पी है या फिर सामाजिक दबावों के आगे झुकता हुआ सिस्टम?
हत्या ने खोला दबे आक्रोश का दरवाज़ा
तुषार हत्याकांड के बाद जिस तरह से व्यापारियों, स्थानीय नागरिकों और परिजनों का आक्रोश सड़कों पर फूटा, वह केवल न्याय की मांग नहीं थी, बल्कि वर्षों से दबे डर, असुरक्षा और आक्रोश की अभिव्यक्ति थी। बाजार बंद रहे, पुलिस बल तैनात करना पड़ा और एहतियातन नगर में धारा 163 लागू करनी पड़ी — यह सब दर्शाता है कि प्रशासन स्थिति को पहले ही गंभीरता से नहीं ले सका।
कानून का डर या कानून की पकड़?
पुलिस ने बाप-बेटे समेत छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है और हत्यारों की तलाश जारी है। लेकिन सवाल केवल गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या कानून का डर केवल घटना के बाद दिखेगा, या अपराध से पहले भी महसूस होगा?
अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस समाधान चाहिए
खटीमा को अब सिर्फ संवेदनशील नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्र के रूप में देखना होगा। यह मामला किसी एक समुदाय, व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक दृढ़ता की परीक्षा है।
यदि मुख्यमंत्री के अपने नगर में यह समस्या दशकों से बनी हुई है, तो यह पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है। अब समय आ गया है कि प्रशासन और सरकार केवल शांति की अपील न करे, बल्कि स्थायी, निष्पक्ष और साहसिक निर्णय लेकर खटीमा को भयमुक्त बनाए।
तुषार की हत्या यदि भी सिस्टम को नहीं झकझोर पाई, तो यह केवल एक जान का जाना नहीं — बल्कि पूरे समाज की हार होगी।
शैल ग्लोबल टाइम्स | विशेष संपादकीय
तुषार हत्याकांड : सवाल जो सिस्टम से जवाब मांगते हैं
खटीमा।
तुषार शर्मा की हत्या एक व्यक्ति की मौत नहीं है—यह कानून, प्रशासन और वर्षों से टलते फैसलों पर एक कठोर अभियोग है। घटना के बाद बाजार क्षेत्र का पुलिस छावनी में बदल जाना बताता है कि हालात कितने विस्फोटक हैं। लेकिन असली सवाल यह है—क्या यह विस्फोट अचानक हुआ, या इसे वर्षों तक सुलगने दिया गया?
सवाल 1: क्या खटीमा में भय और असुरक्षा नई बात है?
जवाब: नहीं।
खटीमा के इस्लाम नगर (गौटिया) क्षेत्र में रहने वाले एक विशेष समुदाय से अन्य समुदायों के लोगों को होने वाली परेशानी और डर कोई आज की कहानी नहीं है। यह पुरानी, जटिल और बार-बार उठने वाली समस्या रही है, जिसकी शिकायतें समय-समय पर होती रहीं—लेकिन समाधान कागज़ों से आगे नहीं बढ़ा।
सवाल 2: जब समस्या पुरानी थी, तो प्रशासन ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की?
जवाब: यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
यदि किसी क्षेत्र में बार-बार तनाव, भय और अपराध की शिकायतें आती हैं, तो निवारक कार्रवाई (Preventive Policing), सामुदायिक हस्तक्षेप, और कानूनी सख़्ती की ज़रूरत होती है। लेकिन यहां कार्रवाई घटना के बाद दिखी—पहले नहीं।
सवाल 3: मुख्यमंत्री के अपने नगर में यह सब कैसे हुआ?
जवाब: यह विडंबना नहीं, चेतावनी है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का खटीमा से सीधा और गहरा संबंध है। घटना स्थल उनके आवास से कुछ ही किलोमीटर दूर है। वे यहीं पले-बढ़े हैं और इस क्षेत्र की सामाजिक जटिलताओं को देखा और भोगा भी है।
फिर भी प्रश्न खड़ा होता है—यदि मुख्यमंत्री के अपने नगर में दशकों पुरानी समस्या जस की तस है, तो प्रदेश के दूर-दराज़ इलाकों का क्या हाल होगा?
सवाल 4: क्या एफआईआर दर्ज होना ही न्याय है?
जवाब: बिल्कुल नहीं।
पुलिस ने बाप–बेटे समेत छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है—यह आवश्यक कदम है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
न्याय तब होगा जब:
- शीघ्र गिरफ्तारी हो
- चार्जशीट समय पर दाख़िल हो
- फास्ट ट्रैक सुनवाई सुनिश्चित की जाए
- और दोषियों को कड़ी सज़ा मिले
⚖️ कानूनी–प्रशासनिक विश्लेषण
- यदि क्षेत्र पहले से संवेदनशील था, तो CrPC की निवारक धाराएँ, हिस्ट्रीशीटर मॉनिटरिंग, और बीट सिस्टम क्यों प्रभावी नहीं हुआ?
- धारा 163 घटना के बाद लगाई गई—क्या यह पहले से लागू होती तो जान बच सकती थी?
- क्या स्थानीय खुफिया तंत्र (Local Intelligence) ने संभावित टकराव की सूचना समय रहते दी थी?
- क्या पुलिस–प्रशासन ने सामुदायिक संवाद और कानून का दृश्यमान डर कायम किया?
सवाल 5: क्या यह मामला केवल कानून का है, या राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी?
जवाब: दोनों का।
कानून तब तक प्रभावी नहीं होता, जब तक उसे राजनीतिक समर्थन और प्रशासनिक साहस न मिले। शांति की अपीलें तब अर्थपूर्ण होती हैं, जब निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई ज़मीन पर दिखे।
निष्कर्ष: अब देर नहीं, निर्णय चाहिए
तुषार हत्याकांड ने खटीमा की वह सच्चाई उजागर कर दी है, जिसे वर्षों से ढका जा रहा था। अब सवाल यह नहीं कि कौन दोषी है, बल्कि यह है कि सिस्टम कब जिम्मेदारी लेगा?
यदि इस घटना के बाद भी स्थायी समाधान, संरचनात्मक सुधार और निष्पक्ष कानून व्यवस्था लागू नहीं होती, तो यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं रहेगी—यह पूरे समाज की हार बन जाएगी।
अब केवल आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए।
अब केवल कार्रवाई नहीं, बदलाव चाहिए।
संपादक दिनेश बम शैलग्लोबल टाइम्स उत्तराखंड।

