— न्यूज़ डेस्क शैल ग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर उत्तराखंड से विशेष रिपोर्ट
देहरादून से लेकर रुद्रपुर तक, और शहरों से लेकर गांवों की शांत गलियों तक—उत्तराखंड में शराब और बार संस्कृति का तेजी से फैलाव अब केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। हाल ही में राजधानी देहरादून में बार और क्लबों से जुड़ी मारपीट, हुड़दंग और गोलीकांड जैसी घटनाओं ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। कई बार सील किए जाने के बावजूद बारों का दोबारा खुल जाना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं जिम्मेदार तंत्र अपनी भूमिका निभाने में विफल रहा है।
देहरादून की घटनाओं के बाद आबकारी विभाग ने सख्ती दिखाते हुए एक दिवसीय और ओकेजनल बार लाइसेंस के लिए पुलिस और जिला आबकारी अधिकारी की एनओसी अनिवार्य कर दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कागजी सख्ती जमीनी हकीकत को बदल पाएगी?

रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है। जहां एक ओर शहर के मुख्य बाजारों, कॉलोनियों और हाइवे किनारे बार और शराब के ठेके तेजी से खुल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अब यह चलन गांवों तक भी पहुंच चुका है। जिन गांवों में कभी शाम होते ही सन्नाटा और शांति होती थी, वहां अब शराब के ठेकों की चहल-पहल और उससे जुड़ी समस्याएं साफ दिखाई देने लगी हैं।
इस बदलती तस्वीर को कुछ यूं बयां करती है यह सायरी—
“गली गली में खुलते बार,
शहर हुआ है लाचार,
चमकती रोशनी के पीछे
छुपा है अंधकार।”
वास्तव में, इन चमकते बारों के पीछे छुपा अंधकार समाज के कई पहलुओं को प्रभावित कर रहा है। युवा पीढ़ी, जो राज्य का भविष्य मानी जाती है, आज नशे की गिरफ्त में आती जा रही है। स्कूल-कॉलेज के आसपास शराब की आसान उपलब्धता, बेरोजगारी और सामाजिक दबाव इस समस्या को और गहरा कर रहे हैं।
“हंसी के नाम पे हुड़दंग,
मस्ती बनती है हथियार,
कौन पूछे उन गलियों से
कितना सहती हर दीवार।”
स्थानीय लोगों का कहना है कि शराब के बढ़ते चलन से घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं और अपराध भी बढ़ रहे हैं। महिलाओं और बुजुर्गों के लिए माहौल असुरक्षित होता जा रहा है। बावजूद इसके, राजस्व के नाम पर सरकार की शराब नीति लगातार विस्तार की ओर बढ़ रही है।
उत्तराखंड सरकार की वर्तमान शराब नीति पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। एक ओर सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए नए ठेकों और बार लाइसेंस को अनुमति दे रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। यह नीति कहीं न कहीं आने वाली पीढ़ी के भविष्य को दांव पर लगाने जैसी प्रतीत होती है।
“एनओसी, नियम और कागज़,
सब लगते बस एक विचार,
जब तक सख्ती सच में ना हो,
कैसे रुके ये व्यापार।”
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन और नियमित निगरानी जरूरी है। साथ ही, युवाओं के लिए रोजगार, खेल और शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है ताकि वे नशे की ओर आकर्षित न हों।
आज जरूरत है एक संतुलित नीति की—जहां राजस्व और विकास के साथ-साथ समाज और भविष्य की भी बराबर चिंता की जाए। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता से अधिक शराब संस्कृति से होने लगेगी।
“गली गली में खुलते बार,
शहर हुआ है बीमार,
अब तो जागो ऐ जिम्मेदार,
वरना डूबेगा ये संसार।”
यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—प्रशासन, समाज और हर उस जिम्मेदार नागरिक के लिए, जो आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित और सशक्त देखना चाहता है।
न्यूज़ डेस्क शैलग्लोबल टाइम्स रुद्रपुर उत्तराखंड

